Govardhan Pooja 2025 : भगवान कृष्ण की लीला

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October 22, 2025


Govardhan Pooja 2025 : भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की कथा, पूजा की विधि, अन्नकूट उत्सव और इस पर्व से मिलने वाले धार्मिक-सामाजिक संदेश को जानिए विस्तार से।

Govardhan Pooja 2025 कब है-

Govardhan Pooja 2025 : गोवर्धन पूजा हर साल दिवाली के अगले दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है। यह पर्व प्रायः अक्टूबर या नवंबर के महीने में आता है। साल 2025 में गोवर्धन पूजा 22 अक्टूबर (बुधवार) को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण की उस अद्भुत लीला की याद दिलाता है जब उन्होंने गोकुलवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया था- ये भी पढ़ें..Asrani Comedy ke Badshah : का निधन (84)

भगवान कृष्ण की गोवर्धन लीला की कथा

Govardhan Pooja 2025 : कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में जब भगवान कृष्ण गोकुल में निवास कर रहे थे, तब उन्होंने देखा कि गांववाले हर वर्ष इंद्र देव की पूजा करते हैं ताकि वर्षा अच्छी हो। कृष्ण ने उन्हें समझाया कि असली आभार तो प्रकृति और गोवर्धन पर्वत का होना चाहिए जो हमें भोजन, जल और जीवन प्रदान करते हैं।

गांववालों ने कृष्ण की बात मान ली और इंद्र पूजा छोड़कर गोवर्धन पर्वत की पूजा की। इससे इंद्र देव नाराज हो गए और गोकुल पर भयानक वर्षा करने लगे। सात दिन तक लगातार बादल बरसते रहे। तब श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी गोकुलवासियों व उनके पशुओं को उसकी छाया में शरण दी। सात दिन बाद इंद्र ने अपनी गलती स्वीकार की और श्रीकृष्ण की स्तुति की। इसीलिए हर साल इस दिन को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट पर्व के रूप में मनाया जाता है।

Govardhan Pooja 2025 की विधि और अनुष्ठान

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Govardhan Pooja 2025 : इस दिन भक्तजन अपने घरों और मंदिरों में मिट्टी या गोबर से गोवर्धन पर्वत का प्रतिरूप बनाते हैं। इसे फूलों, पत्तियों, रंग-बिरंगे धागों और दीपों से सजाया जाता है। फिर भगवान कृष्ण, गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा की जाती है।

  • गोवंश पूजा: इस दिन गायों को स्नान कराकर सजाया जाता है क्योंकि गाय को हिंदू धर्म में माता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है।
  • अन्नकूट भोग: विभिन्न प्रकार के शाकाहारी व्यंजन- जैसे पूरी, कढ़ी, सब्जियाँ, मिठाइयाँ और फल-मिलाकर भगवान को अर्पित किए जाते हैं।
  • गोवर्धन परिक्रमा: विशेषकर मथुरा और वृंदावन क्षेत्र में भक्तजन गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते हैं। यह लगभग 21 किलोमीटर लंबा मार्ग है जिसे पूरा करने से पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अन्नकूट उत्सव का महत्व

अन्नकूट यानी “भोजन का पर्व” -इस दिन का विशेष आकर्षण है। मंदिरों में और घरों में कई प्रकार के व्यंजन बनाकर भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित किए जाते हैं। इसके बाद यह प्रसाद सभी भक्तों में बांटा जाता है। यह पर्व सामूहिकता, साझेदारी और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है जिससे समाज में एकता और प्रेम का संदेश फैलता है।

गोवर्धन पूजा का धार्मिक और सामाजिक संदेश

गोवर्धन पूजा का धार्मिक संदेश यही है कि हमें प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करना चाहिए। भगवान कृष्ण की यह लीला हमें यह सिखाती है कि शक्ति या अहंकार से नहीं, बल्कि प्रेम और सहयोग से जीवन में संतुलन आता है।
यह पर्व गाय, वृक्ष, पर्वत और वर्षा जैसे प्रकृति के तत्वों के प्रति सम्मान बढ़ाता है। गोवर्धन पूजा के माध्यम से लोग यह संकल्प लेते हैं कि वे पर्यावरण का संरक्षण करेंगे और उसकी रक्षा करते रहेंगे।

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निष्कर्ष : Conclusion

Govardhan Pooja 2025 : का पर्व सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि जीवन दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलना चाहिए, अहंकार से दूर रहना चाहिए और समाज में प्रेम, एकता और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भाव रखना चाहिए।

FAQ (Govardhan Pooja 2025)

Q1. गोवर्धन पूजा 2025 कब मनाई जाएगी?
गोवर्धन पूजा साल 2025 में 22 अक्टूबर, बुधवार को मनाई जाएगी, जो दिवाली के अगले दिन आती है।

Q2. गोवर्धन पूजा क्यों मनाई जाती है?
यह पर्व भगवान कृष्ण की उस लीला की याद में मनाया जाता है जब उन्होंने इंद्र के प्रकोप से गोकुलवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत उठाया था। इसके माध्यम से प्रकृति और पर्यावरण के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।

Q3. गोवर्धन पूजा को अन्नकूट क्यों कहा जाता है?
इस दिन भगवान कृष्ण को सैकड़ों प्रकार के व्यंजन अर्पित किए जाते हैं। अन्नकूट का अर्थ है ‘भोजन का विशाल पर्व’, इसी कारण इसे अन्नकूट उत्सव भी कहा जाता है।

Q4. गोवर्धन पूजा में क्या-क्या किया जाता है?
भक्तजन गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाकर पूजा करते हैं, गायों की आराधना करते हैं, अन्नकूट भोग लगाते हैं और गोवर्धन परिक्रमा करते हैं।

Q5. गोवर्धन पूजा से हमें क्या संदेश मिलता है?
यह पर्व हमें सिखाता है कि हमें शक्ति और अहंकार से नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और विनम्रता से जीवन व्यतीत करना चाहिए।

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